Thursday, May 7, 2015

अंजू

मदर्स डे
बात उन दिनो की है जब सन 2004 में, मैं प्रेग्नेंट थी और अपने पहले बच्चे को जन्म देने वाली थी. 9 वा महीना शुरू हो  चुका था और पहले दो बार मिस्केरिज होने के कारण मॆं बेहद तनाव मैं थी और एतिहातन  अपने मायके भोपाल गयी थी.चूँकि मेरे पति उन दिनों दिल्ली ऐयरपोर्ट  में डिप्टी कमिश्नर कस्टम्स जैसे महत्वपूर्ण व व्यस्त पद पर थे अतः  मुझे अकेले ही भोपाल आना पड़ा...मेरी " ड्यू"  डेट करीब पर डाक्टर ने सप्ताह भर का टाइम दे रखा था. उन्ही दिनों  मेरे पापा जो स्वयं एक सीनियर IPS अधिकारी रहे हैं ब कुछ समय पूर्व ही रिटायर हुये थे को किसी काम के सिलसिले में मेरे छोटे भाई के साथ अचानक बाहर जाना पड़ा. मेरे बड़े भाई जो स्वयं डाक्टर है वो भी एक कॉन्फ्रेन्स मॆं हिस्सा लेने दिल्ली गये थे और अगले दिन आने वाले थे. घर मैं, मॆं और मेरी माँ अकेले थे चूंकि डाक्टर ने आगे कि डेट दे  रखी थी अतः सब आश्वस्त थे. जनवरी कि उस रात को शायद साल का वो सबसे सर्द दिन था. रात 2 बजे अचानक मुझे पेट मे तेज दर्द का अहसास हुया. कुछ देर  तो मैंने सहन किया पर जब दर्द ज्यादा बढ़ गया तो मैंने अपनी मम्मी को बुलाना चाहा पर दर्द के मारे मुंह से शब्द नही निकल पा रही थे.किसी तरह मॆंने हिम्मत जुटा कर उन्हे आवाज़ दी.संयोग से माँ जाग रही थी और मेरी हालत देख बुरी तरह घबरा गयी. तुरंत डाक्टर को फोन लगाया पर कोई रिप्लाई नही मिला. मेरा दर्द बढते ही जा रहा और लग रहा था कि अगर तुरंत मेडिकल हेल्प न मिली तो स्थिती बेहद  गम्भीर हो जायेगी. मेरे घर से  हास्पीटल लगभग 5 किलोमीटर दूर था और मम्मी को कार चलना भी नही आता था. समझ नही आ रहा था क्या किया जाये इतनी रात वो भी जनवरी की शायद ही कोइ हो जो गर्म रजाई से बाहर निकलना चाहे.  तभी मम्मी ने आटो बुलाने का निर्णय लिया और  कड़कड़ाती ठंड में घर से निकल पड़ी वे स्वयं हार्ट पेशेंट थी और इतनी ठंड मॆं अचानक बाहर निकलना खतरनाक हो सकता था पर बिना जान कि परवाह किये वे लगभग दौड़ते हुये निकल गयी और चंद मिनटों मॆं एक आटो लेकर लौटी. आनन फानन में मुझे हास्पीटल लाया गया जहाँ मूझे तुरन्त ICU में भर्ती किया गया,पर तब तक मैं शायद  बेहोश ही चुकी थी. दूसरे दिन शाम को जब मूझे होश आया तो मैंने देखा की मैं एक बेटे कि माँ बन चुकी हूँ और मेरे आजु बाजू मेरे पापा, भाई और बड़ी भाभी खड़े हुये हैं.मूझे होश मे देख वे सब बेहद प्रसन्न थे. मैने धीरे से अपनी माँ को पुकारा पर वो नज़र नही आयी.पापा ने बताया कि वे दो रात से जगी हैं इसलिये आराम कर रही हैं. तभी मेंने देखा कि मेरी डॉक्टर अंदर आ रही हैं  और मूझे गले लगा कर बधाई देते हुये बताती हैं कि अगर तुम्हारी मम्मी इतनी तत्परता नहीँ दिखाती तो शायद तुम दोनो का बचना मुश्किल हो जाता. इतना ही नहीँ उन्होने इतनी ठंड मैं हार्ट पेशेंट होते हुये भी जो  दौड भाग कि वो वाकई आश्चर्यजनक  है. रात भर इंजेक्शन ब दवाइयों को लाने का काम उन्होने अकेले ही  किया है. डाक्टर कि ये बातें सुन मेरा चेहरा आँसूओं से सराबोर हो गया मैंने तुरंत माँ से मिलने कि इच्छा व्यक्त कि तब मेरे पापा ने बताया ठंड मे पूरी रात अकेले दौड़ भाग करने के उनका ब्लड प्रेशर काफी बढ़ गया था जिसके  कारण उन्हे भी एडमिट करना पड़ा.पर चिंता कि कोई बात नही तुम्हे और इस नन्ही जान के स्वस्थ होने कि खुशी ने उन्हे वैसे ही फिट कर दिया. मैं फूट फूट कर रो रही थी और व्याकुल थी कब और कितनी जल्दी अपनी माँ से मिल लूं.......
शाम को जब वे कमजोरी की हालत में ही हास्पीटल आयीं तो खुशी और सन्तोष दोनो से उनका चेहरा दमक रहा. एक दूसरे  को देख हम दोनो के आँसू नही रुक रहे थे. मैंने बिलखते हुये पूछा, उस कड़ाके कि ठंड में यदि आप को कुछ हो जाता तो,? मेरे आंसू पोंछते हुये वे थोडी देर चुप रही फ़िर एक गहरी साँस लेकर बोली  "तू भी अब  माँ बन गयी है ना, तूझे अपने प्रश्न का उत्तर भी अब खुद मिल जायेगा...,उस समय तो शायद मैं उनकी बात कि गहराई नही समझ पायी थी पर अब जब कभी अपने बच्चों को जरा भी बीमार देखती हूँ समझ जाती हूँ " माँ" को  इस दुनिया मॆं ईश्वर से भी ऊपर व  सर्वोच्च दर्जा क्यों दिया गया है..
अंजना कटियार
C/o पी.के कटियार,(IRS)
कमिश्नर कस्टम्स,